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जड़ से खत्म किया जा सकेगा पैन्क्रियाटिक कैंसर: स्टडी ऑक्नोटार्गेट जर्नल



वाशिंगटन(ईएमएस)। पैन्क्रियाटिक कैंसर से लड़ने के ‎लिये हाल ही हुए एक ताजा शोध ने उम्मीद जगा दी है। दरअसल एक ताजा रिसर्च में शोधकर्ताओं ने ऐसी तकनीक का पता लगाया है, जिसमें पैन्क्रियास कैंसर सेल्स खुद को ही खत्म करने लगती हैं। यह स्टडी हाल ही ऑक्नोटार्गेट जर्नल में प्रकाशित हुई है। इस तकनीक के परीक्षण में एक महीने के अंदर ही ट्यूमर में डिवेलप सेल्स 90 प्रतिशत तक कम हो गईं थी। इस रिसर्च के बारे में रिसर्चर मलाका कोहेन-अरमन ने कहा कि साल 2017 में प्रकाशित एक स्टडी में एक ऐसे मोलेक्यूल के बारे में बताया गया था, जो बिना नॉर्मल सेल्स को नुकसान पहुंचाए सिर्फ कैंसर सेल्स को खत्म करने का काम करता है।

शोध में हम एक छोटे से मोलेक्यूल से कैंसर सेल्स को खत्म करने का काम बहुत ही सीमित समय में कर सकते हैं।

कोहेन-अरमन इजरायल में तेल अवीव यूनिवर्सिटी से एसोसिएटेड हैं। उन्होंने आगे बताया ‎कि उस स्टडी पर ध्यान केंद्रित करते हुए हमने पैन्क्रियास कैंसर सेल्स पर काम करना शुरू किया और शोध में इसके नतीजे बहुत ही सकारात्मक मिले। इस शोध में हम एक छोटे से मोलेक्यूल से कैंसर सेल्स को खत्म करने का काम बहुत ही सीमित समय में कर सकते हैं। दरअसल, इस मोलेक्यूल का परीक्षण एक चूहे पर किया गया। इस दौरान कैंसर सेल्स से प्रभावित चूहों का इलाज पीजे 34 नामक एक मोलेक्यूल से किया गया यह सेल्स की झिल्ली को भेदने में सक्षम है और ह्यूमन बॉडी में मौजूद कैंसर सेल्स पर अधिक मजबूती के साथ प्रहार करता है। यह मोलेक्यूल मानव कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है और उन्हें अपने विकास के लिए जरूरी तत्व नहीं मिलने देता, जिससे कैंसर कोशिकाएं तेज गति से खत्म होने लगती हैं।

जड़ से खत्म किया जा सकेगा पैन्क्रियाटिक कैंसर
जड़ से खत्म किया जा सकेगा पैन्क्रियाटिक कैंसर

बता दें ‎कि एक महीने में 14 दिन तक लगातार इंजेक्ट किए जाने के अंदर ही पीजे 34 मोलेक्यूल ने ट्यूमर के अंदर मौजूद 90 प्रतिशत कौशिकाओं को पूरी तरह खत्म कर दिया था। जबकि एक अन्य चूहे में इतने वक्त के ट्रीटमेंट का रिजल्ट देखने पर शोधकर्ता हैरान थे। क्योंकि उसके अंदर पेनक्रियाटिक कैंसर के सेल्स 100 प्रतिशत खत्म हो चुके थे। इस रिसर्च के बाद शोधकर्ताओं ने कहा ‎कि इस तरह इन कैंसर सेल्स को खत्म करने के ‎लिये शोध में शामिल चूहों के शारीरिक स्ट्रक्चर, वेट और व्यवहार में कोई बदलाव नहीं हुआ। वहीं शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह मकैनिज़म पूरी दक्षता और क्षमता के साथ दूसरे तरह के कैंसर के इलाज में भी लाभदायक सिद्ध होगा।

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